Ethical Perspectives of Atmanirbharta with Needonomics’ -online Address at HRDC ,GND University, Amritsar

 

Amritsar, Feb.08- “Atmanirbharta is a vaccine within all of us to insulate the viruses out of the minds with purity,” believes Former Vice Chancellor and Kurukshetra based needonomist Professor M.M. Goel. He was online addressing the participants of a refresher course organised by Human Resource Development Centre of Guru Nanak Dev University Amritsar on ‘Ethical Perspectives of Atmanirbharta with Needonomics’ here today. Professor Dr. Kuldeep Kaur delivered welcome address and presented citation on the achievements of Prof. Goel.

‘Atmanirbharta’ has been named Hindi word of the year 2020 by Oxford English Dictionary validating its relevance in present times, told Prof. Goel.

For atmanirbharta to the Indians, needonomics provides insurance as based on Gita used in the logo of LIC of India ‘Yogakshemam Vahamyaham’(Your welfare is our responsibility), told needonomist Goel

We have to adopt secrets of investment in Vedic wisdom of four ashrams (stages of life) with financial planning which bring fearlessness and happiness, told Prof. Goel.

We need REACH  model  consisting of five steps including read gita, empowerment with enlightenment, altruistic approach, commitment and holding needs to obtain atmanirbharta , believes, Prof. Goel.

Economy can be made consumer friendly by adopting NAW (Need, Affordability and Worth) approach of marketing with focus on the need based priorities in choices of all kinds, explained Prof. Goel.

He said that atmanirbharta is necessary and sufficient condition for sustainable development of an economy and its people by keeping a check on greed which is villain for all.

Atmanirbharta calls for street smart Indians as consumers, producers, distributors and traders, told needonomist Goel.

We have to learn best practices from other nations including ‘palli palli’( hurry up and be quick) culture of South Korea and adopt prognosis approach, explained Prof. Goel.

वायरस को  दिमाग से बाहर  करने हेतु  हम सभी के भीतर आत्मनिर्भरता  एक  वैक्सीन है: प्रो. एम.एम. गोयल

अमृतसर, 08 फरवरी- “शुद्धता के साथ वायरस को दिमाग से बाहर  करने हेतु  हम सभी के भीतर आत्मनिर्भरता  एक वैक्सीन (टीका) है ।“ ये शब्द पूर्व कुलपति प्रो. एम.एम. गोयल, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त  नीडोनॉमिस्ट प्रोफेसर  ने  कहे ।वह आज   “नीडोनॉमिक्स के साथ   आत्मनिर्भरता   के नैतिक परिप्रेक्ष्य”   विषय   पर मानव संसाधन विकास केंद्र गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर द्वारा आयोजित  रिफ्रेशर कोर्स के प्रतिभागियों को संबोधित कर रहे थे। प्रोफेसर कुलदीप कौर ने स्वागत भाषण दिया तथा प्रो. एम. एम. गोयल की उपलब्धियों का प्रशस्ति पत्र प्रस्तुत  किया।

प्रो. गोयल ने कहा कि  वर्तमान समय में आत्मनिर्भरता की प्रासंगिकता को सत्यापित करते हुए ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी द्वारा   आत्मनिर्भरता    को वर्ष 2020 का हिंदी शब्द नामित किया गया है ।

प्रो. गोयल ने कहा कि  हमें वित्तीय योजना के साथ जीवन के चार आश्रम  के वैदिक ज्ञान में निवेश के रहस्यों को अपनाना है जो आवश्यकताओं की अर्थशास्त्र को अपनाने से निर्भीकता और खुशी लाता है ।

प्रो. गोयल का मानना है कि एक अर्थव्यवस्था में  निर्वाह योग्य विकास और  लोगों के लिए लालच पर नज़र रखने के साथ आत्मानिर्भरता आवश्यक और पर्याप्त  है जो सभी के लिए अचूक है ।

प्रो. गोयल ने  बताया   कि हमें दक्षिण कोरिया की ‘पल्ली पल्ली ’(जल्दी करो  जल्दी करो) संस्कृति सहित अन्य देशों से सर्वोत्तम प्रथाओं को सीखना होगा ।

प्रो. गोयल ने कहा कि केंद्रीय बजट 2021-22 में आत्मनिर्भरता हेतु प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं और सत्ता और विपक्ष  के राजनेताओं  सहित उपभोक्ताओं, उत्पादकों, वितरक, व्यापारियों को  नीडोनॉमिक्स की शिक्षा की आवश्यकता है ।

प्रो. गोयल का मानना है कि नीडोनॉमिक्स भारतीयों को आत्मनिर्भरता  हेतु  बीमा प्रदान प्रदान करता है चूंकि भारतीय जीवन बीमा निगम  के लोगो में प्रयुक्त गीता ‘योगक्षेमम वहाम्यहम ’ (आपका कल्याण हमारी जिम्मेदारी है) पर आधारित है ।

प्रो. गोयल ने कहा कि  आत्मनिर्भरता  को प्राप्त करने हेतु हमें पांच चरणों से युक्त रीच मॉडल की आवश्यकता  है  जिसमें गीता पढ़ना, ज्ञानवर्धन के साथ सशक्तिकरण, परोपकारी दृष्टिकोण, प्रतिबद्धता और  आवश्यकताएं   पर पकड़ शामिल है ।

प्रो. गोयल का मानना है कि विपणन के एनएडब्ल्यू दृष्टिकोण (आवश्यकता, सामर्थ्य एवं मूल्य ) को अपनाकर  अर्थव्यवस्था को  उपभोक्ता के अनुकूल बनाया जा सकता है ।

प्रो. गोयल ने कहा कि  उपभोक्ताओं, उत्पादकों, वितरकों और व्यापारियों के रूप में भारतीयों को स्ट्रीट स्मार्ट होना चाहिए ।

 

 

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